कोटा। कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन (KSTPS) ने राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) के समक्ष अपनी तकनीकी और व्यावहारिक सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रस्तुत की है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि पावर प्लांट की पुरानी इकाइयों (यूनिट I से V) में संशोधित उत्सर्जन मानदंडों को पूरा करना वर्तमान परिस्थितियों में संभव नहीं है।

पुरानी तकनीक और जगह की कमी बनी बाधा-
प्रबंधन के अनुसार, यूनिट I से V के लिए नए कूलिंग टावरों की स्थापना और इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स (ESPs) का अपग्रेडेशन तकनीकी रूप से व्यावहारिक (feasible) नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण इन इकाइयों का पुराना होना और परिसर में उपलब्ध सीमित स्थान है।

FGD सिस्टम पर भी खड़े किए हाथ-
रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि यूनिट I से IV के लिए फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) प्रणालियों को स्थापित करना भी मुमकिन नहीं है। अधिकारियों ने तर्क दिया है कि ये इकाइयां अपना 25 वर्षों का निर्धारित ‘उपयोगी जीवन काल’ (Useful Life) पहले ही पूरा कर चुकी हैं। ऐसे में, पुरानी हो चुकी मशीनों और सीमित जगह के कारण भारी-भरकम FGD सिस्टम लगाना आर्थिक और तकनीकी रूप से व्यावहारिक नहीं रह गया है।

अब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्णय पर सबकी नजरें टिकी हैं कि क्या इन पुरानी इकाइयों को विशेष छूट मिलेगी या इन्हें चरणबद्ध तरीके से बंद करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे।

*पुरानी यूनिटों निकल रहा जहर वाला दुआ फ्लाई ऐश बन रही जहर*
*विशेष रिपोर्ट: हवा में घुलता ‘धीमा जहर’, फ्लाई ऐश बना रहा है लोगों को बीमार*
2026 — औद्योगिक प्रगति और बिजली उत्पादन की दौड़ में ‘फ्लाई ऐश’ (कोयले की राख) एक अदृश्य दुश्मन बनकर उभर रहा है। हालिया रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चेतावनियों के अनुसार, थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली यह बारीक राख न केवल पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है, बल्कि इंसानी शरीर को भीतर से खोखला कर रही है।

फ्लाई ऐश से होने वाली प्रमुख बीमारियाँ
फ्लाई ऐश में सीसा (Lead), आर्सेनिक, पारा (Mercury) और कैडमियम जैसे जहरीले भारी तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर के अलग-अलग अंगों पर घातक प्रभाव डालते हैं:

श्वसन संबंधी गंभीर रोग (Respiratory Diseases):
अस्थमा और ब्रोंकाइटिस: राख के बारीक कण फेफड़ों के गहराई तक जाकर सूजन और सांस लेने में तकलीफ पैदा करते हैं।
सिलिकोसिस (Silicosis): इसमें मौजूद सिलिका के कारण फेफड़ों के ऊतकों (tissues) पर निशान पड़ जाते हैं, जो आगे चलकर जानलेवा साबित हो सकते हैं।
COPD: लंबे समय तक संपर्क में रहने से क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज का खतरा बढ़ जाता है।
कैंसर का खतरा (Cancer Risk):
आर्सेनिक और हेक्सावैलेंट क्रोमियम जैसे तत्वों की मौजूदगी के कारण इसे कार्सिनोजेनिक माना जाता है, जिससे फेफड़ों के कैंसर का खतरा काफी अधिक होता है。
हृदय रोग और स्ट्रोक (Heart & Stroke):
अध्ययनों ने फ्लाई ऐश के संपर्क और हृदय रोगों के बीच सीधा संबंध पाया है, जिससे समय से पहले मौत का जोखिम बढ़ जाता है।
अन्य शारीरिक प्रभाव:
आंखों और त्वचा में जलन: हवा में उड़ती राख आंखों में खुजली, जलन और त्वचा संबंधी एलर्जी का कारण बनती है।
बच्चों के विकास पर असर: इसके संपर्क में रहने वाले बच्चों में न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याएं जैसे ADHD और पाचन संबंधी विकार देखे गए हैं।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु: क्यों है यह खतरनाक?
प्रदूषण का दायरा: थर्मल प्लांट के 5 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले निवासियों में श्वसन संबंधी शिकायतों की दर सबसे अधिक पाई गई है।
पानी और भोजन में जहर: जब यह राख जलाशयों में गिरती है, तो भारी धातुएं भूजल (groundwater) में मिल जाती हैं, जिससे पीने का पानी भी जहरीला हो जाता है।
खेती पर असर: राख जमने से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है और फसलों के जरिए यह जहरीले तत्व हमारी खाद्य श्रृंखला (food chain) में प्रवेश कर रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय और सरकारी कदम
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि फ्लाई ऐश का 100% उपयोग (जैसे ईंट बनाने या सड़क निर्माण में) अनिवार्य होना चाहिए। हाल ही में, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने फ्लाई ऐश के असुरक्षित परिवहन और डंपिंग के लिए कई कंपनियों पर भारी जुर्माना भी लगाया है।
सावधानी ही बचाव है: प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सलाह दी जाती है कि वे बाहर निकलते समय मास्क का उपयोग करें और पीने के पानी की शुद्धता की नियमित जांच करवाएं।
क्या आप अपने क्षेत्र के पॉवर प्लांट या औद्योगिक इकाई के खिलाफ प्रदूषण संबंधी शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया जानना चाहते हैं

*कोयले के धुएं से सेहत पर गहरा संकट: विशेषज्ञों ने जारी की चेतावनी*
पत्थर के कोयले (Coal) का इस्तेमाल आज भी कई घरों और उद्योगों में ऊर्जा के मुख्य स्रोत के रूप में किया जा रहा है, लेकिन इससे निकलने वाला धुआं इंसानी सेहत के लिए किसी ज़हर से कम नहीं है। हालिया रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कोयले के धुएं के लंबे समय तक संपर्क में रहने से न केवल फेफड़े बल्कि हृदय और मस्तिष्क पर भी गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं।
कोयले के धुएं से होने वाली मुख्य बीमारियां
कोयले के दहन से निकलने वाली जहरीली गैसें जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और बारीक कण (PM 2.5) शरीर में प्रवेश कर निम्नलिखित रोगों का कारण बनते हैं:
ब्लैक लंग डिजीज (Coal Worker’s Pneumoconiosis): यह मुख्य रूप से कोयले की धूल और धुएं में रहने वाले लोगों को होती है। इससे फेफड़े धीरे-धीरे काले पड़ जाते हैं और उनकी ऑक्सीजन सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है。
सीओपीडी (COPD): क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें सांस की नलियां सिकुड़ने लगती हैं, जिससे मरीज़ को लगातार ऑक्सीजन सपोर्ट की ज़रूरत पड़ सकती है।
फेफड़ों का कैंसर (Lung Cancer): अध्ययनों के अनुसार, कोयले के धुएं में मौजूद कार्सिनोजेनिक तत्व फेफड़ों में कैंसर की कोशिकाओं को सक्रिय कर सकते हैं।
हृदय रोग और स्ट्रोक: प्रदूषित कण खून में मिलकर धमनियों को ब्लॉक कर सकते हैं, जिससे हार्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
सांस संबंधी अन्य समस्याएं: अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, निमोनिया और आंखों में लगातार जलन इसके शुरुआती लक्षण हैं।
कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता: बंद कमरों में कोयला जलाने से निकलने वाली यह गैस ‘साइलेंट किलर’ मानी जाती है, जिससे दम घुटने के कारण सोते हुए ही व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
घटक स्वास्थ्य पर प्रभाव
बारीक कण (PM 2.5) फेफड़ों की गहराई तक जाकर सूजन पैदा करते हैं।
सल्फर डाइऑक्साइड गले में खराश और सांस लेने में भारीपन का कारण।
नाइट्रोजन ऑक्साइड फेफड़ों की कार्यक्षमता को कम करता है।
बचाव के उपाय
विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि खाना पकाने या गर्मी के लिए कोयले के बजाय स्वच्छ ईंधन (LPG या बिजली) का उपयोग करें। यदि कोयले का उपयोग अनिवार्य हो, तो सुनिश्चित करें कि वेंटिलेशन (हवा की निकासी) की उचित व्यवस्था हो और बंद कमरे में इसे कभी न जलाएं।
क्या आप अपने क्षेत्र में प्रदूषण के स्तर या कोयले के सुरक्षित विकल्पों के बारे में और जानना चाहते हैं?

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*बड़ी खबर: 2030 तक रिटायर नहीं होंगे पुराने बिजली घर, केंद्र सरकार ने जारी किए निर्देश*
नई दिल्ली: देश में बिजली की लगातार बढ़ती मांग को देखते हुए भारत सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) और विद्युत मंत्रालय ने सभी राज्यों और बिजली कंपनियों को स्पष्ट सलाह दी है कि वे वर्ष 2030 तक अपनी किसी भी पुरानी थर्मल यूनिट (कोयला आधारित बिजली घर) को बंद या रिटायर न करें।
क्यों लिया गया यह फैसला?
सरकार का मानना है कि औद्योगिक गतिविधियों और घरेलू खपत में भारी उछाल के कारण ऊर्जा की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है। ऐसे में नई यूनिट्स के पूरी तरह चालू होने तक पुरानी यूनिट्स को बैकअप और निरंतर आपूर्ति के लिए चालू रखना अनिवार्य है।
मुख्य बिंदु:
एडवाइजरी जारी: बिजली मंत्रालय ने 20 जनवरी 2023 को पत्र जारी कर सभी यूटिलिटीज को इस संबंध में सूचित कर दिया था।
मांग का दबाव: बिजली की भारी किल्लत से बचने के लिए सरकार फिलहाल ‘रिटायरमेंट’ की नीति को टाल रही है।
थर्मल पर निर्भरता: हालांकि सरकार रिन्यूएबल एनर्जी पर जोर दे रही है, लेकिन बेस लोड (स्थिर आपूर्ति) बनाए रखने के लिए थर्मल पावर अभी भी सबसे भरोसेमंद जरिया है।
इस फैसले से साफ है कि सरकार आने वाले वर्षों में “जीरो ब्लैकआउट” (बिना बिजली कटौती) के लक्ष्य पर काम कर रही है और किसी भी स्थिति में सप्लाई कम नहीं होने देना चाहती।
क्या
*कोटा थर्मल पावर स्टेशन की कोई भी यूनिट नहीं होगी बंद, ऊर्जा मंत्री ने अफवाहों को किया खारिज*
कोटा/जयपुर। राजस्थान के ऊर्जा मंत्री ने कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन (KSTPS) की इकाइयों के बंद होने की खबरों पर विराम लगा दिया है। मंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कोटा थर्मल की किसी भी यूनिट को बंद करने का कोई विचार नहीं है और जनता को इस तरह की अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
अफवाहों पर ध्यान न दें: ऊर्जा मंत्री
पिछले कुछ दिनों से चल रही चर्चाओं, जिनमें पुरानी इकाइयों (यूनिट I से IV) के 25 साल पूरे होने और तकनीकी सीमाओं के कारण उनके बंद होने की अटकलें लगाई जा रही थीं, उन्हें मंत्री ने सिरे से नकार दिया है। उन्होंने कहा, “कोटा थर्मल प्रदेश की ऊर्जा जरूरतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यहाँ की सभी इकाइयां सुचारू रूप से कार्य करती रहेंगी।”
प्रदूषण मानकों और तकनीकी चुनौतियों का समाधान
हालांकि, प्लांट प्रबंधन ने राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) को सौंपी रिपोर्ट में यह बताया था कि पुरानी इकाइयों में जगह की कमी और उम्र के कारण ‘फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन’ (FGD) और आधुनिक ‘कूलिंग टावर’ लगाना व्यावहारिक (feasible) नहीं है। इसके बावजूद, सरकार का रुख स्पष्ट है कि बिजली उत्पादन में कोई कटौती नहीं की जाएगी और मौजूदा व्यवस्था के साथ ही प्लांट का संचालन जारी रहेगा।
कर्मचारियों और शहरवासियों को राहत
मंत्री के इस बयान के बाद थर्मल के कर्मचारियों और स्थानीय निवासियों ने राहत की सांस ली है। कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन न केवल बिजली उत्पादन का केंद्र है, बल्कि यह कोटा की अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी माना जाता है।
अब सरकार इन पुरानी इकाइयों को आधुनिक मानकों के साथ तालमेल बिठाते हुए कैसे आगे बढ़ाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
क्या
*कोटा थर्मल पावर प्लांट का प्रदूषण: डॉक्टरों ने जताई चिंता, पुरानी इकाइयों को बताया सेहत के लिए ‘खतरनाक’*
कोटा। कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन (KSTPS) की पुरानी इकाइयों से होने वाले उत्सर्जन को लेकर शहर के चिकित्सा विशेषज्ञों ने गंभीर चेतावनी जारी की है। राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) को सौंपी गई रिपोर्ट में प्रबंधन ने स्वीकार किया है कि यूनिट I से V में प्रदूषण नियंत्रण के आधुनिक उपकरण (ESP और FGD) लगाना संभव नहीं है, क्योंकि ये इकाइयां अपनी 25 साल की उम्र पूरी कर चुकी हैं।
डॉक्टरों की चेतावनी: ‘धीमा जहर’ बन सकता है धुआं
शहर के वरिष्ठ श्वसन रोग विशेषज्ञों (Pulmonologists) का कहना है कि अगर इन पुरानी इकाइयों में इलेक्ट्रोस्टैटिक प्रेसिपिटेटर्स (ESP) का अपग्रेडेशन और फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम नहीं लगाया जाता, तो हवा में सल्फर डाइऑक्साइड और बारीक कणों (PM 2.5) की मात्रा खतरनाक स्तर तक बनी रहेगी।
डॉक्टरों के अनुसार, इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं:
फेफड़ों की बीमारियां: बिना फिल्टर वाली हवा से दमा (Asthma) और सीओपीडी (COPD) के मरीजों की संख्या बढ़ सकती है।
हृदय रोग: लंबे समय तक ऐसे वातावरण में रहने से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा रहता है।
बच्चों पर असर: प्रदूषित हवा बच्चों के फेफड़ों के विकास को रोक सकती है।
क्या है विशेषज्ञों का तर्क?
डॉक्टरों का मानना है कि ’25 साल की उपयोगी अवधि’ पार कर चुकी इन इकाइयों को चलाना तकनीकी मजबूरी हो सकती है, लेकिन जनस्वास्थ्य के नजरिए से यह एक बड़ा जोखिम है। सीमित स्थान (Limited Space) का तर्क देकर प्रदूषण नियंत्रण मानकों की अनदेखी करना शहरवासियों की सेहत के साथ समझौता करने जैसा है।
अब देखना यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जनता के स्वास्थ्य और थर्मल प्लांट की व्यावहारिक समस्याओं के बीच क्या संतुलन बनाता है।
चंबल नदी पर थर्मल प्रदूषण के मुख्य प्रभाव
तापमान में वृद्धि: थर्मल प्लांट से निकलने वाला पानी नदी के सामान्य तापमान से लगभग

से

तक अधिक होता है।
ऑक्सीजन की कमी: पानी का तापमान बढ़ने से उसमें घुली हुई ऑक्सीजन (Dissolved Oxygen) का स्तर कम हो जाता है, जिससे जलीय जीवों का दम घुटने लगता है।
घातक रसायनों का मिश्रण: गर्म पानी के साथ-साथ बॉयलर ब्लोडाउन और भारी धातुएं (जैसे लेड, आर्सेनिक और क्रोमियम) भी नदी में मिल रही हैं।

होने वाली प्रमुख हानियाँ
जलीय जीवन पर संकट: चंबल नदी लुप्तप्राय घड़ियाल और गांगेय डॉल्फिन का घर है। अत्यधिक गर्म पानी इनके प्राकृतिक आवास को नष्ट कर रहा है और उनकी प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहा है।
मछलियों की मृत्यु: नदी के पारिस्थितिकी तंत्र में बदलाव के कारण मछलियों की कई प्रजातियां मर रही हैं, जिसका सीधा असर स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर पड़ रहा है।
खतरनाक शैवाल (Algae) का पनपना: गर्म पानी के कारण नदी में कुछ विशेष प्रकार के सायनोबैक्टीरिया (जैसे Synechococcus) की संख्या बढ़ गई है, जो पानी को जहरीला बना सकते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां (मानव प्रभाव)
नदी के प्रदूषित पानी का उपयोग करने वाले आसपास के ग्रामीणों और पशुओं को निम्नलिखित स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:
त्वचा रोग: प्रदूषित और रसायनों युक्त पानी के संपर्क में आने से खुजली, रैशेज और अन्य चर्म रोग होने का खतरा रहता है।
पेट की बीमारियां: यदि इस पानी का उपयोग बिना उचित शुद्धिकरण के किया जाता है, तो इसमें मौजूद भारी धातुओं और बैक्टीरिया के कारण टाइफाइड, पेचिश और पेट के संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
भारी धातुओं का दुष्प्रभाव: पानी में मौजूद लेड (Lead) और आर्सेनिक (Arsenic) लंबे समय में नसों, किडनी और लीवर को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

प्रशासनिक कार्रवाई
NGT ने कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन को निर्देश दिया है कि वे:
चंबल में प्रदूषित पानी का बहाव तुरंत रोकें।
मार्च 2026 तक कूलिंग टावर और आवश्यक ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण पूरा करें।
कार्य पूरा होने तक प्रति नाला 5 लाख रुपये प्रतिमाह का पर्यावरणीय मुआवजा दें।

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